Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 5 ISSUE.: 4(April 2026)

भारतीय परिस्थिति में अस्तित्ववादी दर्शन की शैक्षिक उपादेयता


Author(s): डॉ. सुरेन्द्र प्रताप


Abstract:

अस्तित्ववादी विधारधारा के अनुसार मानव अनुभूति करने में सक्षम है। वह जो बनना चाहता है, बन ही जाता है। उसमें क्षमता है, वह स्वतंत्र है। वह जिस रूप में अपने को देखना चाहता है, उसको देखने की क्षमता रखता है। मनुष्य अपने अनुकूल क्रियाओं को चयन भी स्वयं करता है। शिक्षा का लक्ष्य उसे इस योग्य बनाने का होना चाहिये कि वह अपने मूल्यों का चयन कर सके। शिक्षा द्वारा ही व्यक्ति आत्मविश्वासी बनने का अवसर पायेगा। यद्यपि कुछ दार्शनिक, शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा में स्वतंत्रता, प्रामाणिक अस्तित्व, वैयक्तिकता, चयन शक्ति आदि के आधार पर अस्तित्ववादी शैक्षिक उपयोगिता को स्वीकार करने में आपत्ति की और कहा कि अस्तित्ववादी शैक्षिक, उपयोगिता को स्वीकार करने में आपत्ति की और कहा कि अस्तित्ववादी सिध्दान्तों को शिक्षा में लागू नहीं किया जा सकता। लेकिन आधुनिक शैक्षिक युग में इसे नकारा नहीं जा सकता। प्रत्येक बालक अपनी योग्यताओं, क्षमताओं, रूचि एवं अभिवृत्तियो में अद्वितीय होता है। अतः शिक्षा का परम लक्ष्य होना चाहिये कि प्रत्येक बालक को अपने गुणों व सम्भावनाओं को विकसित करने का अवसर मिले।

keywords:
भारतीय परिस्थिति, अस्तित्ववादी दर्शन, शैक्षिक

Pages: 141-144     |    8 View     |    1 Download

How to Cite this Article:

डॉ. सुरेन्द्र प्रताप. भारतीय परिस्थिति में अस्तित्ववादी दर्शन की शैक्षिक उपादेयता. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(4):141-144,