Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 4(April 2026)
Author(s): डॉ. मुमताज़ परवीन
Abstract:
इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण, उदारीकरण और डिजिटल क्रांति ने भारतीय साहित्य और सिनेमा को अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय विस्तार प्रदान किया है। पहले जहाँ भारतीय रचनाएँ सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही पहुँच पाती थीं, वहीं अब इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीकों के कारण वे विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुँच रही हैं। यह शोध-पत्र इस तथ्य का विश्लेषण करता है, कि किस प्रकार भारतीय रचनात्मक अभिव्यक्तियाँ राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाकर विश्व संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग बन गई हैं। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अनुवाद, प्रवासी लेखन, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, ओटीटी प्लेटफॉर्म तथा वैश्विक बाजार की संरचना ने भारतीय साहित्य और सिनेमा को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित किया है। साथ ही यह भी प्रतिपादित किया गया है, कि इस वैश्वीकरण ने भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता को एक ओर सुदृढ़ किया है, तो दूसरी ओर उसे नई चुनौतियों के सम्मुख भी खड़ा किया है। वैश्वीकरण के युग में भारत की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ साहित्य और सिनेमा राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व-मंच पर स्थापित हो चुकी हैं। भारतीय कथाएँ, मिथक, लोकपरंपराएँ, सामाजिक यथार्थ और आध्यात्मिक दृष्टि आज विभिन्न भाषाओं और माध्यमों के जरिए विश्व के पाठकों और दर्शकों तक पहुँच रही हैं। यह प्रक्रिया केवल प्रसार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद, प्रभाव और आदान-प्रदान का भी प्रतीक है।
keywords:
वैश्वीकरण, साहित्य, सिनेमा, तकनीक, सकारात्मक प्रभाव, नकारात्मक प्रभाव, महत्व, निष्कर्ष।
Pages: 98-102 | 6 View | 1 Download
How to Cite this Article:
डॉ. मुमताज़ परवीन. इक्कीसवीं सदी में भारतीय साहित्य और सिनेमा का वैश्वीकरण. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(4):98-102,