Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 1(January 2026)
Author(s): सत्य नरायन यादव और डॉ. पी.एस. त्यागी
Abstract:
श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय पर आधारित यह शोध ज्ञानार्जन और धारण की प्रक्रिया को एक नवीन आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक धरातल प्रदान करता है। स्वामी प्रभुपाद के 'भगवद्गीता यथारूप' दर्शन के अनुसार, शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि चित्त का शोधन और मन पर विजय प्राप्त करना है। शोध के प्रथम चरण में यह स्पष्ट होता है कि ज्ञानार्जन की सफलता विद्यार्थी की एकाग्रता पर निर्भर करती है, जिसे गीता 'इंद्रिय-निग्रह' (श्लोक 13) के माध्यम से समझाती है। जब विद्यार्थी 'समं कायशिरोग्रीवं' की मुद्रा में स्थिर होकर अपनी इंद्रियों को बाहरी आकर्षणों से समेट लेता है, तब उसका मस्तिष्क संज्ञानात्मक रूप से इतना सजग हो जाता है कि वह कठिन से कठिन विषय को भी सुगमता से ग्रहण कर पाता है। स्वामी प्रभुपाद इस प्रक्रिया में 'कृष्णभावनामृत' को जोड़ते हैं, जिसका तात्पर्य है कि जब मन एक उच्च ध्येय से जुड़ जाता है, तो उसकी चंचलता स्वतः समाप्त हो जाती है और सीखने की गति तीव्र हो जाती है।
शोध का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष धारण (Retention) प्रक्रिया है, जो ज्ञान को स्मृति से प्रज्ञा में रूपांतरित करती है। गीता के अनुसार, धारण शक्ति का सबसे बड़ा बाधक मानसिक द्वंद्व और तनाव है। श्लोक 7 और 9 में वर्णित 'समदर्शी' भाव विद्यार्थी को सफलता-विफलता और मान-अपमान जैसे मनोवैज्ञानिक दबावों से मुक्त करता है। एक शांत और स्थिर चित्त ही ज्ञान को स्थायी रूप से संजोकर रख सकता है, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान 'डीप एनकोडिंग' कहता है। इसके साथ ही, 'युक्ताहारविहार' (श्लोक 17) का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि विद्यार्थी का शारीरिक और जैविक तंत्र भी ज्ञान को धारण करने के अनुकूल बना रहे। संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या मस्तिष्क की धारण क्षमता को अक्षुण्ण रखती है।
अंततः, यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से जब विद्यार्थी का चित्त 'विनियत' (श्लोक 18) हो जाता है, तब वह एक स्थितप्रज्ञ व्यक्तित्व की ओर अग्रसर होता है। स्वामी प्रभुपाद के अनुसार, ऐसा विद्यार्थी न केवल सांसारिक ज्ञान में निपुण होता है, बल्कि उसमें सत्य को पहचानने और उसे जीवन में उतारने की प्रज्ञा भी जाग्रत होती है। इस प्रकार, गीताधारित ध्यान-योग शिक्षा को एक 'बोझ' के बजाय एक 'आनंदमयी यात्रा' (दुःखहा योग) बना देता है, जहाँ ज्ञानार्जन और धारण स्वतः होने वाली सहज प्रक्रियाएं बन जाती हैं I
keywords:
श्रीमद्भगवद्गीताधारित ध्यान-योग, ज्ञानार्जन प्रक्रिया, धारण प्रक्रिया, विश्लेषणात्मक अध्ययन I
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How to Cite this Article:
सत्य नरायन यादव और डॉ. पी.एस. त्यागी. श्रीमद्भगवद्गीताधारित ध्यान-योग: ज्ञानार्जन एवं धारण प्रक्रिया का विश्लेषणात्मक अध्ययन. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(1):160-163,