Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
Mail: allstudy.paper@gmail.com
Contact: +91-9650866419
Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 1(January 2026)
Author(s): Dr. Sandeep Kumar
Abstract:
प्रस्तुत शोध पत्र आधुनिक भारत के निर्माता और समाज सुधारक डॉ. भीमराव अंबेडकर के उन क्रांतिकारी प्रयासों का विश्लेषण करता है, जिन्होंने भारतीय समाज के हाशिए पर खड़े दलित समुदाय में 'चेतना' का संचार किया। शोध का मुख्य केंद्र डॉ. अंबेडकर के उस दर्शन को समझना है, जहाँ उन्होंने 'अस्पृश्य' माने जाने वाले वर्ग को एक राजनीतिक और सामाजिक पहचान प्रदान की। इस अध्ययन में महाड़ सत्याग्रह और कालाराम मंदिर प्रवेश जैसे आंदोलनों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि कैसे उन्होंने भौतिक अधिकारों (जैसे जल और मंदिर प्रवेश) को मानवीय गरिमा के साथ जोड़ा। शोध पत्र उनके द्वारा प्रतिपादित "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो" के सिद्धांत की महत्ता को रेखांकित करता है, जिसने दलितों में हीनभावना को समाप्त कर आत्म-सम्मान की भावना भरी। इसके अतिरिक्त, यह पत्र भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका का मूल्यांकन करता है, जहाँ उन्होंने अनुच्छेद 17 के माध्यम से अस्पृश्यता के उन्मूलन और आरक्षण के माध्यम से प्रतिनिधित्व को सामाजिक न्याय का अनिवार्य अंग बनाया। अंततः, यह शोध पत्र स्पष्ट करता है कि डॉ. अंबेडकर का योगदान केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने एक ऐसे समतावादी लोकतंत्र की नींव रखी जहाँ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, and Fraternity) मौलिक आधार हैं।
keywords:
Pages: 01-06 | 3 View | 1 Download
How to Cite this Article:
Dr. Sandeep Kumar. डॉ. बी. आर. अंबेडकर का दलित चेतना के उदय और सामाजिक न्याय में योगदान. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(1):01-06,