Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 1(January 2026)
Author(s): रूपेश कुमार एवं डॉ. अनिल कुमार
Abstract:
बिहार की आर्थिक संरचना मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। राज्य के अधिकांश कृषक लघु-सीमांत श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। इसके अतिरिक्त अधिकांश लोग गरीब एवं बेरोजगार हैं। इनके आय सीमित होने के कारण पर्याप्त बचत करने में असमर्थ रहते हैं। अतः ऐसी परिस्थिति के परिणामस्वरूप, कृषि एवं इससे जुड़े लोगों का निजी निवेश में संभावनाएँ सीमित हो जाती है, जिसके कारण निवेश करने के लिए वित्तीय स्रोत से ऋण प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है। वित्तीय स्रोत दो तरह की होती है- संस्थागत एवं गैर-संस्थागत वित्तीय स्रोत। संस्थागत वित्तीय स्रोत, जो विभिन्न स्तर पर ऋण उपलब्ध कराती है, इनका संचालन सरकार एवं भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) करती है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को ऋण लेने में बड़ी समस्या होती है, क्योंकि ये लोग सीमांत कृषक, मजदूर एवं गरीब होते हैं, जिसके कारण संस्थागत वित्तीय संस्थाओं की शर्तों को पूरी करने में सफल नहीं हो पाते, परिणामस्वरूप इसे संस्थागत वित्तीय स्रोतों से उचित मात्रा में लाभ नहीं मिल पाता है। दूसरी ओर, गैर-संस्थागत वित्तीय स्रोतों में महाजन, साहूकार, व्यापारी आदि जो ग्रामीण क्षेत्र में ऋण प्रदान करते है। इससे ऋण लेना सरल होता है किंतु अधिक ब्याज दर एवं कठोर पुनर्भुगतान के कारण गरीब व्यक्ति ऋण में दब जाते हैं। जीविका परियोजना समान आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं को संगठित कर उन्हें सामूहिक बचत और ऋण प्रणाली के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाती है। जीविका स्वयं सहायता समूह के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 1% मासिक साधारण ब्याज की दर पर ऋण उपलब्ध कराती है। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएँ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जीविका द्वारा संगठित समूह एवं संस्थागत वित्तीय स्रोतों से ऋण प्राप्त कर रहीं हैं और ऐसी महिलाएँ गैर-संस्थागत स्रोतों के ऊँचे ब्याज दर वाले ऋण भार से काफी हद तक मुक्त होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से सशक्त भी हो रहीं है।
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How to Cite this Article:
रूपेश कुमार एवं डॉ. अनिल कुमार. ग्रामीण महिलाओं की वित्तीय उपलब्धता में “जीविका” कार्यक्रम की भूमिका: एक अनुभवजन्य अध्ययन. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(1):75-79,