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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 4 ISSUE.: 9(September 2025)

भारतीय ज्ञान परम्परा में दर्शन, साहित्य और संस्कृति का प्रदेय


Author(s): डॉ. भरत सिंह


Abstract:

भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में दर्शन, साहित्य और संस्कृति का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। वास्तव में भारतीय ज्ञान परम्परा एक समृद्ध और व्यापक प्रणाली है जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक नई दिशा देने का कार्य किया है। यदि बात दर्शन की करें तो इसमें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा तथा वैदिक आदि एक प्राचीन और व्यापक प्रणाली है जो विविध दार्शनिक दृष्टिकोण और ज्ञान को विवेचित करता है । वहीं दूसरी ओर साहित्य एवं संस्कृति दोनों ही भारतीय ज्ञान परम्परा में अपनी महनीय भूमिका का निर्वहन करती है । साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है अतएव समाज में जो कुछ भी घटित होता है साहित्यकार उसे शब्दों में रूपायित कर उसकी विवेचना करता है । भारतीय साहित्य विशेषकर हिंदी भाषा और साहित्य वैदिक एवं लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य की यात्रा करते हुए भारतीय ज्ञान परम्परा को अपने में समेटे हुए है । वास्तव में वेद और संस्कृत साहित्य भारतीय ज्ञान परम्परा के मेरुदण्ड हैं । इन्हीं की भावभूमि से भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्य, पंच महायज्ञ, षोड्स संस्कार, आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान, शिक्षा पद्धति तथा व्यावहारिक ज्ञान प्रस्फुटित होता है जो भारतीय ज्ञान परम्परा को समृद्ध करता है । जबकि दूसरी ओर संस्कृति का सीधा सम्बन्ध जनसामान्य के लोकजीवन, लोक संस्कृति, परम्पराओं, रीति-रिवाजों और लोकाचार से होता है जिसके माध्यम से जनसामान्य की जीवन पद्धति का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है । अतएव कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान परम्परा में भारतीय दर्शन, साहित्य और संस्कृति का योगदान महत्त्वपूर्ण है।

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How to Cite this Article:

डॉ. भरत सिंह. भारतीय ज्ञान परम्परा में दर्शन, साहित्य और संस्कृति का प्रदेय. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(9):71-73,