Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 9(September 2025)
Author(s): राखी
Abstract:
मानव जीवन और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ धर्म ने न केवल सामाजिक व्यवस्था और नैतिकता को दिशा दी, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि भी प्रदान की। धार्मिक परंपराओं ने सदैव यह संदेश दिया कि प्रकृति केवल भौतिक संसाधन नहीं है, बल्कि यह जीवन का आधार और अस्तित्व का मूल है। विश्व के सभी धर्मों और धार्मिक परंपराओं की शिक्षाओं में पर्यावरणीय चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपराओं में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि, वायु, जल, सूर्य, आकाश और पृथ्वी को देवताओं का रूप प्रदान किया गया है। ऋग्वेद में पर्यावरणीय संतुलन के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं। उपनिषदों में ‘ईशावास्यमिदं सर्वं…’ का सिद्धांत सम्पूर्ण सृष्टि को परमात्मा का स्वरूप बताकर उसके संरक्षण का संदेश देता है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी वन, नदियों और पशु-पक्षियों के प्रति आदर और संवेदनशीलता प्रकट होती है। जैन धर्म में अहिंसा का सिद्धांत केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक जीव-जन्तु, वृक्ष और सूक्ष्म जीवों तक विस्तारित है। पर्यावरणीय दृष्टि से जैन धर्म का यह विचार आधुनिक ‘ईको-फ्रेंडली एथिक्स’ का आधार बनता है। इसी प्रकार बौद्ध धर्म ने करुणा और मध्यम मार्ग के सिद्धांत द्वारा मनुष्य को उपभोग की अति से बचने की शिक्षा दी है। बौद्ध भिक्षु प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सिख धर्म के ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ की वाणी में जल, वायु और पृथ्वी को गुरु और माता का रूप दिया गया है। ‘सरबत दा भला’ का संदेश केवल मानव समाज तक नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत और प्रकृति तक विस्तारित है। इस्लाम धर्म में कुरआन और हदीस में पृथ्वी को अल्लाह की अमानत कहा गया है। मनुष्य को ‘खलीफा’ अर्थात् संरक्षक का पद दिया गया है, जिससे उसका कर्तव्य है कि वह पर्यावरण का संरक्षण करे। इसी प्रकार ईसाई धर्म में ‘सृष्टि का संरक्षक’ बनने की अवधारणा निहित है। बाइबिल में प्रकृति के संरक्षण और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर बल दिया गया है। पारसी धर्म में अग्नि और सूर्य की पूजा पर्यावरणीय पवित्रता का प्रतीक है। यहूदी धर्म में ‘बाल तशचित’ का सिद्धांत संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी को रोकने की शिक्षा देता है। शिंतो परंपरा में प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व को पवित्र आत्मा का रूप मानकर उसके संरक्षण की परंपरा है। बहाई धर्म में सृष्टि के सभी तत्त्वों को परमात्मा की रचना मानकर उनके संतुलन और संरक्षण का उपदेश दिया गया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि विश्व के सभी धार्मिक परंपराओं में प्रकृति को केवल भौतिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि दिव्यता और जीवन के आधार के रूप में देखा गया है। यह दृष्टि आधुनिक पर्यावरण संकट के समाधान के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है। जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, प्रदूषण और जैव विविधता की हानि जैसी समस्याएँ गहरी होती जा रही हैं, तब धार्मिक परंपराओं की यह चेतना एक संतुलित और स्थायी विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
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Pages: 98-104 | 2 View | 0 Download
How to Cite this Article:
राखी. धार्मिक परंपराओं में पर्यावरण चेतना. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(9):98-104,