Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 9(September 2025)
Author(s): Dr. Kirti Kumari
Abstract:
स्वामी विवेकानन्द (1863–1902) आधुनिक भारत के उन महान दार्शनिकों और समाज सुधारकों में से हैं जिनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय पुनर्जागरण के केंद्र में रहा। औपनिवेशिक पराधीनता के दौर में जब भारतीय समाज हीनभावना, सामाजिक विभाजन और सांस्कृतिक हीनता से ग्रस्त था, तब विवेकानन्द ने आत्मगौरव, आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिक शक्ति का संदेश दिया। उन्होंने शिकागो धर्म संसद (1893) में भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता का परिचय देकर न केवल भारत की छवि को विश्व पटल पर स्थापित किया बल्कि भारतीय समाज को आत्मविश्वास भी प्रदान किया। उनका दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित था, जिसमें ‘मानव सेवा ही ईश्वर सेवा’ का विचार केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम न मानकर “मनुष्य निर्माण” की प्रक्रिया बताया। सामाजिक क्षेत्र में जातिगत संकीर्णताओं और स्त्री शिक्षा की उपेक्षा का विरोध करते हुए उन्होंने सेवा और समानता का मार्ग सुझाया। राजनीतिक दृष्टि से यद्यपि वे प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रहे, परंतु उनके विचारों ने महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस और अरविन्द घोष जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को गहराई से प्रभावित किया। यह शोध-पत्र विवेकानन्द के जीवन-विचारों का समालोचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह दिखाता है कि उन्होंने किस प्रकार आधुनिक भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण, शैक्षिक सुधार, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। साथ ही, यह अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि उनके विचार आज के भारत में भी शिक्षा नीति, युवा सशक्तिकरण और सामाजिक सौहार्द्र के संदर्भ में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।
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How to Cite this Article:
Dr. Kirti Kumari. आधुनिक भारत की वैचारिक और सांस्कृतिक संरचना में स्वामी विवेकानन्द का प्रभाव: एक विचारपरक अध्ययन. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(9):18-24,