Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 4 ISSUE.: 5(May 2025)

संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों का व्यवहार में संतुलित करना


Author(s): डॉ. प्रमोद सिंह


Abstract:

विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश की संवैधानिक प्रावधानों में नागरिकों और व्यक्तियों के सम्पूर्ण विकास के लिए संविधान में मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। स्वतंत्रता से पहले औपनिवेशिक शासन पहले भारत के लोगों के साथ किया गया दुर्यव्यहार, शोषण और भारत में जाति व्यवस्था के अन्तर्गत समाहित भेदभाव और स्वतंत्रता काल में होने वाले धार्मिक, सम्प्रदायिक उथल पुथल न मानवीय प्रतिष्ठा और गरिमा को तितर-बितर कर दिया था। सभी व्यक्ति एक-दूसरे को अविश्वास की निगाह से देखने लगे थे और ऐसी स्थिति में संविधान निर्माताओ के सम्मुख देश की एकता अखण्डता, मानवीय गरीमा को बनाये रखना और सभी लोगों में विश्वास बनाने जैसी चुनौतिया थी। इस चुनौती को मंजूर करते हुए संविधान निर्माताओं ने सार्वभौमिक अधिकारो का प्रबन्ध किया 1.संविधान के भाग -3 में अनुच्छेद 12-35 तक मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया। जो नागरिको के उत्पान में अहम योगदान दिया है। आरम्भ में संविधान में नागरिको को के लिए मूल कर्तव्यों का प्रबन्दा नहीं था, परन्तु समय के साथ समाज में असामाजिक और देश अविरोधी तत्वों में बढ़ोत्तरी हुई, नतीजन ऐसी गतिविधियो के प्रति नागरिको को सचेत करने और कर्तव्य की भावना जगाने व प्रसार के लिए सन 1976 में संविधान के भाग-4क में अनुच्छेद 51क’ के अन्तर्गत मूल कर्तव्यो का प्रबन्ध किया गया है। 2. हाल ही में नई दिल्ली में सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन-2020 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मूल कर्तव्यो पर सभी का ध्यान खिंचा और इसे केन्द्रीय धारा में ला दिया है।

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Pages: 164-166     |    3 View     |    0 Download

How to Cite this Article:

डॉ. प्रमोद सिंह. संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों का व्यवहार में संतुलित करना. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(5):164-166,