Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 3(March 2025)
Author(s): डॉ. शिव कुमार व्यास
Abstract:
साहित्य मनुष्य की ह्नदयगत् अनुभूतियों का प्रतिबिंब होता है। यही कारण है कि किसी कवि अथवा लेखक की रचना सह्नदय को अपनी और सहज ही आकृष्ट कर लेती है। साहित्य की विशिष्टता है कि वह सह्नदय को लोकोत्तर भावभूमि पर प्रतिष्ठित कर रस की अनुभूति कराता है, इस रसानुभूति की प्रक्रिया को संस्कृत, हिन्दी एवं पाश्चात्य काव्य शास्त्रियों जैसे भरत मुनि, महलोल्लट, शंकुक, भट्टनायक वामन आचार्य शुक्ल, केशव प्रसाद मिश्र, आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी, नागेन्द्र, प्लेटों, अरस्तु, वदसवर्थ, लौजाइनस, इलियट, फ्रायड आदि प्रमुख है, जिन्होंने भिन्न-भिन्न स्थापनाओं के माध्यम से इस तथ्य् का समर्थन किया है कि रसानुभूति, अथवा अनंदानुभूति हेतु साधारणीकरण आवश्यक है, जिसमें प्रमाता का सामाजिक, आश्रय के साथ तादात्म्य स्थापित कर अपनत्व और परख के भावों से ऊपर उठ जाता है।
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Pages: 24-27 | 2 View | 0 Download
How to Cite this Article:
डॉ. शिव कुमार व्यास. साधारणीकरण एवं उसके समतुल्य अन्य पाशचात्य सिद्धांत. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(3):24-27,