Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 3(March 2025)
Author(s): भोलानाथ साहा एंव डॉ. रेनू शुक्ला
Abstract:
संस्कृत काव्य को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है- दृश्य और श्रव्य। जब मंच पर अभिनेता और अभिनेत्रियाँ अभिनय प्रस्तुत करते हैं और दर्शक उसे देखकर रस का अनुभव करते हैं, तब उसे -दृश्यकाव्य कहा जाता है। यह -श्यकाव्य रूपक और उपरूपक में विभाजित होता है। -दृश्यकाव्य किस प्रकार का होगा? किसके द्वारा इसका अभिनय किया जाएगा? कैसे और किस स्थान पर यह अभिनय होगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर देने के लिए ब्रह्मा के निर्देश से भरतमुनि ने श्नाट्यशास्त्रश् की रचना की। यह ग्रंथ 36 अध्यायों से समन्वित है और इसे श्पंचम-नाट्यवेदश् कहा जाता है। इसका सृजन ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय, और अथर्ववेद से रस लेकर किया गया। नाटक की विषयवस्तु अत्यंत आकर्षक होती है। इसलिए -श्य और श्रव्य दोनों तत्व इनमे समन्वित किये गए हैं। जिसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, वह हृदय में प्रवेश करता है। आँखों के सामने घटित होने वाली घटना को देखकर और सुनकर सामान्य लोग भी उसके मर्म को समझ सकते हैं और उससे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। मुख्य बात यह है कि इस अभिनय कला को देखकर दर्शकों के मन में एक अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। यहां नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति, रंगशाला का निर्माण, साज-सज्जा, नृत्य, गीत, रस निर्धारण, भाव निर्धारण, चार प्रकार की अभिनय कला की दक्षता आदि कई चीजों पर चर्चा की गई है, जिससे दर्शक या पाठक इसे देखकर या सुनकर इसके साथ एकात्म हो सके। नाट्यशास्त्र में चतुर्विध अभिनय की बात की गई है, जिसमें दर्शक रस का अनुभव कर सकते हैं। भरतमुनि द्वारा अपने नाट्यशास्त्र में श्रृंगार, हास्य आदि आठ प्रकार के रसों का भी उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार, जब स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संपर्क में आता है, तो वह रस में परिबर्तित हो जाता है। महाकवि कालिदास ने इन सभी नियमों का पालन करते हुए श्अभिज्ञानशकुंतलम्श् की रचना की। विशेष रूप से उन्होंने चतुर्विध अभिनय की मधुरता को गहनता से प्रकाशित किया है। वाचिक अभिनय या संवादों के बिना नाटक का अभिनय पूर्ण नहीं हो सकता, यह बात महाकवि कालिदास ने कुशलतापूर्वक दिखाया है। उन्होंने अपने पात्रों के संवादों में उपमा का कुशल प्रयोग कर वाचिक अभिनय को अद्वितीय बना दिया है। नाटक के पाँचवें अंक में विशेष रूप से जो वाचिक अभिनय प्रस्तुत किया गया है, वह अत्यधिक अर्थपूर्ण हो गया है। इस वाचिक अभिनय के माध्यम से पात्रों के संवादों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है। इस शोधपत्र में यह प्रस्तुत किया है कि नाटक के घटनाक्रम को आगे बढ़ाने और उसमें नाटकीयता उत्पन्न करने में वाचिक संवादों का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है।
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How to Cite this Article:
भोलानाथ साहा एंव डॉ. रेनू शुक्ला. अभिज्ञानशाकुंतलम् नाटक के पाँचवें अंक में वर्णित वाचिक अभिनय की विशेषता. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(3):21-23,