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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 4 ISSUE.: 2(February 2025)

भवभूति के रूपकों में जल संरक्षण की अवधारणा


Author(s): डॉ. कृष्ण कुमार भास्कर


Abstract:

महाकवि भवभूति संस्कृत के लब्ध प्रतिष्ठित कवियों में माने जाते है। भवभूति पर्यावरणीय चित्रण के मर्मज्ञ, सिद्धहस्त कवि है जो अपनी तीनों रचनाओं में पर्यावरण के विविध स्वरूपों को आलंबन और उद्धीपन दोनों प्रकार से सम्यक रूप में चित्रित किया है। काव्यदर्श के रचनाकार आचार्य दण्डी ने भी महाकाव्य के लक्षण का वर्णन करते हुए कहते है कि काव्य मे नगर, समुद्र, शैल, ऋतु, चन्द्रमा, सूर्य, वन-उपवन, विहार, जलक्रीड़ा आदि का वर्णन किया जाना चाहिए जिससे काव्यगत सौन्दर्य मे वृद्धि हो सके इसी प्रकार साहित्यदर्पण के रचनाकार आचार्य विश्वनाथ कहते है कि महाकाव्य मे संध्या, सूर्य, चन्द्रमा, रात्रि, प्रदोषकाल, अन्धकार, दिन, प्रातः काल, मध्यान्तर, पर्वत, ऋतु, वन, समुद्र के सौन्दर्य का मनोरम चित्रण किया जाना चाहिए। अतः महाकवि भवभूति ने भी अपने रूपकों में पर्यावरण के संदर्भ में जल तत्व का वृहद् वर्णन किया है और यह शिक्षा दिया है कि सभी सामान्य व्यक्ति भी जल को बचाने की पूरा प्रयास करे जिससे आने वाली पीढ़ी को जल संकट का सामना करना न पडे़ क्योंकि संपूर्ण पृथ्वी में जल की मात्रा लगभग 70 से 75 प्रतिशत है किन्तु मानव उपयोगी जल की मात्रा उससे बहुत कम अर्थात् मात्र 3 प्रतिशत लगभग है और विश्व में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिक विकास ने जल की जरूरत, आवश्यकता या खपत की मात्रा को बढ़ा दिया है इसलिये जल संरक्षण अतिआवश्यक हो गया है इसलिये महाकवि भवभूति अपने रूपकों में जल को स्वच्छ और संरक्षित करने के लिये प्रेरित करते है जिसका वर्णन इस शोध-पत्र में प्रस्तुत किया गया है।

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How to Cite this Article:

डॉ. कृष्ण कुमार भास्कर. भवभूति के रूपकों में जल संरक्षण की अवधारणा. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(2):74-76,