Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 4 ISSUE.: 1(January 2025)

पृथ्वी सूक्त में पर्यावरण के संदर्भ में


Author(s): राष्ट्रीयता कुमारी


Abstract:

मानव जाति का आदि ग्रंथ वेद हैं। वैदिक ग्रंथों में पृथ्वी की माता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हैं। अथर्ववेद के 12 वे कांड का प्रथम सूक्त पृथ्वी सूक्त है। अथर्वण ऋषि ने कुल 63 मन्त्रों में मातृरूपिणी भूमि की समय पार्थिव पदार्थों की जननी तथा पोषिका के रूप में महिमा समुद्घोषित की है. तथा प्रजा की समस्त बुराइयों, क्लेशो तथा अनर्थों से बचाने व सुख संपति की वृष्टि के लिए प्रार्थना की है। पृथ्वी सूक्त की भूमि सूक्त व मातृ सूक्त भी कहा जाता है। पृथ्वी सूक्त में पर्यावरण से संबंधित विशिष्ट ज्ञान का समावेश किया गया है। पृथ्वी सूक्त में प्रकृति को विशिष्ट अवधी भूत तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पृथ्वी सूक्त में पर्यावरण के जीव जगत के चर अचर संबंधों का है अद्वितीय ज्ञान मुखरित किया गया है। पृथ्वी सूक्त के मंत्रों की वैज्ञानिकता वर्तमान समय में पर्यावरण से ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होती है। पृथ्वी के पर्यावरण, जीव जगत, चर अचर के सम्बन्धों की जो वैज्ञानिकता इन मंत्रों से मुखरित हुई हैं। पृथ्वी सूक्त राष्ट्रीय अवधारणा तथा वसुदेव कुटुंबकम की भावना को विकसित करने के साथ- साथ पर्यावरण के प्रति स्नेहशील संबंध स्थापित करता है।

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How to Cite this Article:

राष्ट्रीयता कुमारी. पृथ्वी सूक्त में पर्यावरण के संदर्भ में. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(1):21-23,