Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 3 ISSUE.: 12(December 2024)

हिन्दी उपन्यासों में संघर्ष का बदलता स्वरूप


Author(s): शैलेंद्र कुमार सिंह


Abstract:

हिन्दी उपन्यास अपने आरंभ से लेकर वर्तमान तक कई प्रभावों को ग्रहण करता हुआ लगातार विकसित हुआ है। आरंभ में यह आदर्श, शिक्षा, नैतिकता और समाजिकता जैसे विषयों को लेकर चला। इन उपन्यासों में वर्णित संघर्ष भी इसी स्वरूप में अभिव्यक्त हुआ है। आगे चलकर यह औपनिवेशिक और कृषक संघर्षों की विस्तृत गाथा से जुड़ता है जहाँ हिन्दी उपन्यासों का लेखन भी सशक्त दिखाई देता है। हिन्दी उपन्यास आगे चलकर व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों को भी दर्ज करता है। आज़ादी के बाद विभाजन की त्रासदी, राजनीतिक, स्वतन्त्रता से मोहभंग, मशीनीकरण, शहरीकरण, और ग्रामीण अंचल के परिप्रेक्ष्य में वर्णित होता है। बीसवीं सदी के अंत तक यह असमितमूलक संघर्षों को व्यापक अभिव्यक्ति देता है। इक्कीसवीं सदी के साथ यह बाजारवाद, पॉपुलर कल्चर, उपभोक्तावाद, सूचनाक्रांति, आर्थिक सत्ता प्रतिष्ठानों आदि से संघर्ष करता नजर आता है।

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Pages: 55-58     |    2 View     |    0 Download

How to Cite this Article:

शैलेंद्र कुमार सिंह. हिन्दी उपन्यासों में संघर्ष का बदलता स्वरूप. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(12):55-58,