Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 3 ISSUE.: 11(November 2024)
Author(s): शनि कुमार धारी
Abstract:
आधुनिकीकरण और जनजाति अस्मिता का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल है। भारत के जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अस्मिता सदियों से उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों, भाषा, विश्वासों, तथा सामूहिकता पर आधारित रही है। आधुनिकता के प्रभाव ने उनके सामाजिक, आर्थिक, तथा सांस्कृतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन लाया है, जिससे उनके अस्तित्व और अस्मिता पर अनेक चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। इन समुदायों पर शिक्षा, औद्योगिकीकरण, और वैश्वीकरण के प्रभाव ने उनके पारंपरिक मूल्यों और जीवनशैली को प्रभावित किया है। इससे उनका सांस्कृतिक विरासत के प्रति जुड़ाव कमजोर होता जा रहा है, और सामुदायिक एकता में विघटन की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आधुनिकीकरण ने जहाँ जनजातीय समाज को शिक्षा, स्वास्थ्य, तथा आर्थिक उन्नति के अवसर प्रदान किए हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी अस्मिता को भी खतरा पैदा किया है। आधुनिक संचार माध्यमों, उपभोक्तावाद, और बाहरी संस्कृति के अतिक्रमण ने जनजातीय संस्कृति में बाहरी तत्वों का समावेश किया है, जिससे उनके पारंपरिक जीवन मूल्य और पहचान में क्षरण हो रहा है। इसके साथ ही, आधुनिकता के प्रभाव ने जनजातीय युवाओं को अपनी जड़ों से दूर कर दिया है, जिससे वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर से कटते जा रहे हैं। हालाँकि, अनेक जनजातीय समुदाय आधुनिकता को अपने ढंग से स्वीकार कर रहे हैं और सांस्कृतिक पुनरुद्धार की कोशिश में जुटे हैं। वे अपने पारंपरिक ज्ञान, कला, और भाषाओं को सहेजने के साथ-साथ नए आर्थिक और सामाजिक अवसरों का लाभ उठा रहे हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि विकास की प्रक्रिया में जनजातीय अस्मिता का संरक्षण किया जाए ताकि वे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को बरकरार रखते हुए समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रख सकें।
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How to Cite this Article:
शनि कुमार धारी. आधुनिकीकरण एवं जनजाति अस्मित. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(11):25-30,