Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 5 ISSUE.: 6(June 2026)

भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी उपन्यास: अस्मिता, विस्थापन और बदलती संस्कृति


Author(s): डॉ. शिव कुमार व्यास


Abstract:

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने २१वीं सदी के आते-आते भारतीय समाज के आंतरिक ढाँचे को समूल परिवर्तित कर दिया है। भूमंडलीकरण ने जहाँ एक ओर भौगोलिक दूरियों को मिटाकर विश्व को एक 'वैश्विक ग्राम' में तब्दील किया, वहीं दूसरी ओर इसने स्थानीय संस्कृतियों, मानवीय संवेदनाओं और पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं के समक्ष गहरा संकट उत्पन्न कर दिया है। साहित्य समाज की गत्यात्मकता का जीवंत दस्तावेज़ होता है; अतः समकालीन हिंदी उपन्यासों ने भूमंडलीकरण के इस बहुआयामी प्रभाव को बेहद संजीदगी और आक्रामक प्रतिरोध के साथ दर्ज किया है। प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी उपन्यासों के भीतर उभरने वाले तीन केंद्रीय विमर्शों—अस्मिता का संकट, भौतिक व मानसिक विस्थापन तथा उपभोक्तावादी बाज़ार के कारण बदलती संस्कृति का आलोचनात्मक एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण करना है। यह आलेख अलका सरावगी, संजीव, महुआ माजी, उदय प्रकाश, मैत्रेयी पुष्पा और अनूप कुमार जैसे प्रतिनिधि रचनाकारों के उपन्यासों के आलोक में यह उद्घाटित करता है कि नव-उदारवादी पूंजीवाद ने किस प्रकार हाशिए के समाज (स्त्री, दलित, किसान और आदिवासी) को उसकी जड़ों से बेदखल कर अस्मिता विहीनता की ओर धकेला है। अंततः, यह शोध यह भी रेखांकित करता है कि समकालीन हिंदी उपन्यास इन विसंगतियों के विरुद्ध किस प्रकार एक वैचारिक और सांस्कृतिक प्रतिरोध की भूमिका निर्मित कर रहा है।

keywords:
भूमंडलीकरण, हिंदी उपन्यास, अस्मिता विमर्श, विस्थापन, उत्तर-आधुनिकता, बाज़ारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, महानगरीय बोध।

Pages: 30-32     |    16 View     |    1 Download

How to Cite this Article:

डॉ. शिव कुमार व्यास. भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी उपन्यास: अस्मिता, विस्थापन और बदलती संस्कृति. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(6):30-32,