Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 5(May 2026)
Author(s): डॉ. शिव कुमार व्यास
Abstract:
प्रस्तुत शोध आलेख छायावादोत्तर हिंदी काव्य (1936 ई. से अद्यतन) का भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में एक व्यवस्थित अध्ययन है। यह आलेख इस धारणा का खंडन करता है कि छायावादोत्तर कविता केवल पश्चिमी 'वादों' (मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद) की अनुगामिनी थी। इसके विपरीत, यह प्रमाणित करता है कि अज्ञेय, दिनकर, मुक्तिबोध और कुँवर नारायण जैसे कवियों ने भारतीय दर्शन के मूलभूत प्रत्ययों-जैसे 'ऋत', 'शून्य', 'अद्वैत' और 'स्थितप्रज्ञता'-को समकालीन वैश्विक संकटों के समाधान हेतु पुनर्व्याख्यायित किया। काव्य-उद्धरणों के सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से यह शोध 'परंपरा' और 'आधुनिकता' के मध्य एक संश्लिष्ट दार्शनिक अंतर्संबंध को रेखांकित करता है।
keywords:
भारतीय ज्ञान परंपरा, छायावादोत्तर काव्य, अद्वैत, ऋत, शून्य, आधुनिकता, मिथक, लोकमंगल।
Pages: 06-07 | 2 View | 1 Download
How to Cite this Article:
डॉ. शिव कुमार व्यास. भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में छायावादोत्तर काव्य: युगीन संकट और दार्शनिक सातत्य. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(5):06-07,