Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 4(April 2026)
Author(s): डॉ.राधेश्याम पी.ठाकोर
Abstract:
सूअरदान’ एक व्यंग्यात्मक और यथार्थवादी उपन्यास है, जिसमें भारतीय समाज की जातिगत व्यवस्था, पाखंड और सत्ता के दुरुपयोग पर तीखा प्रहार किया गया है। कहानी का केंद्र एक ऐसे गाँव और उसके आसपास का सामाजिक ढांचा है, जहाँ ऊँच-नीच, छुआछूत और धार्मिक आडंबर गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं।उपन्यास में ‘सूअरदान’ की अवधारणा के माध्यम से यह दिखाया गया है कि किस तरह धर्म और परंपराओं का इस्तेमाल करके गरीब और निम्न वर्ग के लोगों का शोषण किया जाता है। कथानक में विभिन्न पात्रों के जरिए यह उजागर किया गया है कि कैसे उच्च वर्ग अपने स्वार्थ के लिए नियम बनाता और तोड़ता है, जबकि निम्न वर्ग उन नियमों का बोझ उठाने को मजबूर रहता है।लेखक ने व्यंग्य और कटाक्ष के माध्यम से समाज की विडंबनाओं को उजागर किया है। साथ ही, यह उपन्यास मानवीय संवेदनाओं, संघर्ष और बदलाव की आवश्यकता को भी दर्शाता है। ‘सूअरदान’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के खोखले मूल्यों और असमानताओं पर गहरी टिप्पणी है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है।
keywords:
‘सूअरदान’ उपन्यास में चित्रित जातिवाद की समस्या ।
Pages: 45-49 | 14 View | 3 Download
How to Cite this Article:
डॉ.राधेश्याम पी.ठाकोर. सूअरदान उपन्यास में चित्रित जातिवाद की समस्या. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(4):45-49,