Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 7(July 2025)
Author(s): डॉ. रवि कृष्ण कटियार
Abstract:
हिन्दी से यहाँ तात्पर्य जनसामान्य द्वारा रोजमर्रा में प्रयोग किये जाने वाले उन जीवंत शब्दों अथवा वाक्यों से है जिसे सामासिक संस्कृति की तर्ज पर नारायण प्रसाद बेताब कुछ यूँ लिखते हैं कि-
‘न ठेठ हिन्दी, न खालिस उर्दू, जुबान गोया मिली जुली हो,
अलग रहे दूध से न मिसरी डली, डली दूध में घुली हो।’
उक्त विषयक हिन्दी के प्रचार-प्रसार में पारसी रंगमंच ने अभूतपूर्व योगदान दिया है और उसी क्रम में लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा भी योगदान दे रहा है। हिन्दी भाषा के वैश्विक स्तर पर होने वाले व्यापक प्रसार में जहाँ एक ओर प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया ने महती भूमिका अदा की है, वहीं हिन्दी फिल्मों का योगदान भी उत्कृष्ट है। आज हिन्दी लगभग सम्पूर्ण भारत में बोली और समझी जाने वाली भाषा बनने के क्रम में एक विश्व-व्यापी भाषा बनने की ओर भी निरन्तर अग्रसर है। हिन्दी फिल्मों के गाने, नृत्य, संवाद हर जगह लोकप्रिय हो रहे हैं। हिन्दी की व्यापारिक लोकप्रियता और प्रभाविकता का आलम यह है कि आज विश्व स्तर पर कोई भी फिल्म बनें उसका हिन्दी भाषी रूपान्तरण उपलब्ध हो जाता है। जन सामान्य की हिन्दी को जनमानस में लोकप्रिय बनाने में पारसी रंगमंच एवं लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा का अभूतपूर्व योगदान रहा है। हिन्दी-पारसी रंगमंच ने जिस हिन्दी भाषा को भारतव्यापी बनाया था आज हिन्दी सिनेमा ने उसे विश्वव्यापी बना दिया है। आज हिन्दी भाषी फिल्मों को डब करके एवं विदेशी फिल्मों को हिन्दी में डब करके एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है, जिससे हिन्दी के भाषिक महत्व को एक विश्व स्तरीय विश्वसनीयता प्राप्त हो रही है।
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How to Cite this Article:
डॉ. रवि कृष्ण कटियार. हिन्दी के प्रचार-प्रसार में पारसी रंगमंच एवं लोकप्रिय हिंदी सिनेमा का योगदान. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(7):32-34,