Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 4 ISSUE.: 6(June 2025)

महाकुम्भ का समसामयिक महत्व


Author(s): डॉ. दिनकर त्रिपाठी


Abstract:

‘वास्तव में यह समग्र भारत था। कैसा आश्चर्यजनक विश्वास जो हजारों वर्ष से इनके पूर्वजों को देश के कोने-कोने से खींच लाता है।’ पं. जवाहर लाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में लिखा है। वे कुंभ पर आश्चर्यचकित थे। ठीक इंसप्रकार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने कहा है "महाकुंभ भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है और आस्था एवं सद्भाव का उत्सव है I"यह प्रयागराज में विश्व का सबसे बड़ा मेला है। महाकुंभ देश-विदेश के अनगिनत श्रद्धालुओं की  जिज्ञासा है। भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष के अनुभवों का परिणाम है। संस्कृति और परंपरा अंधविश्वास नहीं हैं। राष्ट्र जीवन में बहुत कुछ करणीय है और बहुत कुछ अकरणीय। यहां धर्म, दर्शन, संस्कृति, परंपरा और आस्था राष्ट्रजीवन के नियामक तत्व हैं। ये पांच तत्व राष्ट्रजीवन को ध्येय और शक्ति देते हैं। कुंभ मेला इन्हीं पांचों तत्वों की अभिव्यक्ति है। महाकुंभ समागम संस्कृति प्रेमियों का महाउल्लास है। कुंभ स्थल प्रयाग संगम की भूमि भी है। संगम का अर्थ है मिलना। प्रयाग तीन नदियों का संगम है। यहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियां गले मिलती हैं। यह यज्ञ, साधना, योग और आत्मदर्शन का पुण्य क्षेत्र रहा है।  ऋग्वेद के ऋषि ‘इमे गंगे यमुने सरस्वती..’ गाकर स्तुति करते हैं। कुछ सरस्वती को स्वीकार नहीं करते। सरस्वती का अस्तित्व सिद्ध हो चुका है। ऋग्वेद में सरस्वती को नदीतमा कहा गया है। तीनों संगम में मिलती हैं। तब तप, यज्ञ और योग की तपोभूमि प्रयाग हो जाती है और प्रयाग हो जाता है तीर्थराज। प्रयाग सामान्य नगर क्षेत्र नहीं है। सरकारें खूबसूरत नगर बना सकती हैं, लेकिन प्रयाग जैसा तीर्थ कोई भी सत्ता नहीं बना सकती। प्रयाग जैसे तीर्थ हजारों वर्ष की तप साधना में विकसित होते हैं। गजब की है यह पुण्यभूमि। पाणिनि ने यहीं पर अष्टाध्यायी लिखी थी। इंडोनेशिया के प्रसिद्ध  ‘ककविन’ में भी प्रयाग कुंभ की महिमा है l दिव्य-भव्य महाकुंभ 2025 का समापन हो चुका है, लेकिन इसकी दिव्यता, भव्यता और सेवा भावना की यादें हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई हैं। अगले छह साल बाद लगने वाले कुंभ तक के लिए श्रद्धालु तो विदा हो चुके हैं l

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Pages: 119-121     |    1 View     |    0 Download

How to Cite this Article:

डॉ. दिनकर त्रिपाठी. महाकुम्भ का समसामयिक महत्व. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(6):119-121,