Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 4 ISSUE.: 10(October 2025)
Author(s): डॉ. अनुपम कुमारी
Abstract:
बौद्धकालीन भारत में दार्शनिक विचारधारा एवं चिंतन की महती लहर उमङते हुए हम देखते हैं। बौद्ध धर्म के जो विचारक लोग थे उनके लिए तर्क ही उनका प्रमुख शस्त्रागार था। जहां पर सार्वभौम खण्डनात्मक समालोचना के शस्त्र गढ़कर तैयार किए गए थे। नींव को अत्यधिक गहराई में डाले जाने की जरूरत का ही परिणाम महान दार्शनिक हलचल के रूप में अवतरित हुआ। जिससे 6 दर्शनों की उत्पत्ति हुई। जिसमें धर्म एवं काव्य का स्थान शुष्क समीक्षा तथा विश्लेषण ने ले लिया। रूढ़िवादी लोग अपने चिंतन तथा विचारों को संहिताबद्ध करने एवं उनके रक्षा हेतु तार्किक प्रमाणों का आश्रय लेने को बाध्य हो गए। वे आध्यात्मिक जीवन एवं ब्रह्म ज्ञान की सुंदर व्याख्या करते हैं अगर मनुष्य यथार्थ सत्य की प्राप्ति तर्क के द्वारा नहीं कर सकता है तो अवश्य ही उसे उन महान एवं आदर्श ऋषियों के महान लेख की सहायता प्राप्त करनी चाहिए। इस प्रकार से जो कुछ भी श्रद्धा के माध्यम से अंगीकार किया गया था उसे यथार्थता को तर्क के माध्यम से प्रमाणित करने का प्रबल प्रयास ही दर्शनशास्त्र है क्योंकि इस प्रयास का अन्य नाम दर्शन है जो मनुष्य के अनुभवों का वर्णन एवं व्याख्या करने के लिए उपयोग किया जाता है।
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Pages: 90-93 | 3 View | 0 Download
How to Cite this Article:
डॉ. अनुपम कुमारी. दर्शनशास्त्र का प्रादुर्भाव एवं वेदों के साथ संबंध. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2025; 4(10):90-93,