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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 3 ISSUE.: 8(August 2024)

प्रेमचंद की कहानियों में सामाजिक विषमताओं का यथार्थपरक चित्रण


Author(s): चंद्रहास


Abstract:

हिंदी कथा-साहित्य में मुंशी प्रेमचंद का स्थान युगप्रवर्तक साहित्यकार के रूप में स्थापित है। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज के विविध पक्षों का अत्यंत यथार्थवादी चित्रण किया। उनकी कहानियाँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों का जीवंत दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। प्रेमचंद ने किसान, मजदूर, दलित, स्त्री, निम्न एवं मध्यम वर्ग सहित समाज के उपेक्षित वर्गों की समस्याओं को अपनी कहानियों का विषय बनाया। उनकी रचनाओं में गरीबी, शोषण, जातिगत भेदभाव, सामंती व्यवस्था, धार्मिक रूढ़ियाँ, भ्रष्टाचार तथा मानवीय मूल्यों के संकट का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। प्रेमचंद की कहानियाँ सामाजिक यथार्थ को केवल प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि उसके कारणों का विश्लेषण भी करती हैं तथा समाज में परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। उनके पात्र वास्तविक जीवन से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और पाठक को सामाजिक विषमताओं के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। उनकी दृष्टि मानवतावादी है, जिसमें न्याय, समानता, करुणा और नैतिकता को विशेष महत्व दिया गया है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। यह शोध-पत्र प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों-पूस की रात, कफ़न, ईदगाह, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, नमक का दारोगा तथा बड़े घर की बेटी-के आधार पर सामाजिक यथार्थ के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

keywords:
प्रेमचंद, सामाजिक यथार्थ, किसान, दलित, स्त्री, गरीबी, शोषण, मानवीय मूल्य, हिंदी कहानी।

Pages: 164-168     |    21 View     |    1 Download

How to Cite this Article:

चंद्रहास. प्रेमचंद की कहानियों में सामाजिक विषमताओं का यथार्थपरक चित्रण. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(8):164-168,