Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 3 ISSUE.: 6(June 2024)
Author(s): डाॅ. शिव कुमार व्यास
Abstract:
अज्ञेय हिन्दी की प्रयोगवादी काव्य धारा के प्रर्वतक कवि है, साहित्य जगत में उनका प्रवेश उस संधिकाल में होता है जिस काल में छायावादी काव्यधारा मंद हो चली थी और उसका स्थान एक नई काव्यधारा ले रही थी जो नये-नये प्रयोगों से परिपूर्ण थी अब साहित्य शिल्पी नवीन भाव भूमि पर काव्य सृजन कर रहे थे। साहित्य के इस युग में भी कवियों की दृष्टि से प्रकृति ओझल नहीं हुई अपितु अधिक विस्तृत भाव भूमि पर चित्रित हुई। अज्ञेय की प्रकृति चेतना का संबंध सौंदर्य चेतना के साथ-साथ रहस्य चेतना से भी है यही कारण है कि उनकी प्रकृति चित्रण संबंधी कविताओं का कैनवास बहुत विस्तृत एवं व्यापक है, उन्होंने सत्यान्वेषण, सौंदर्य बोध और आत्मबोध प्रकृति से ही प्राप्त किया है। प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानसिक जुड़ाव, दृश्य के साथ अंतदर्शन का संयोग तथा विराट के साथ लघु का मेल उनके प्रकृति चित्रण की विशिष्टता है। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं- ‘‘दुनिया में इतना कुछ, देखने को पड़ा है। क्षण-क्षण परिवर्तित प्रकृति वेश जिसे उसने आँख भर देखा। इसे देखने से उसे इतना अवकाश कहाँ कि वह निगाह अपनी ओर मोड़े। वह तो जितना कुछ देखता है उससे भी आगे बढ़ने की विवशता में देता है मन को दिलासा, पुनः आऊंगा भले ही बरस दिन अगणित युगों के बाद।
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How to Cite this Article:
डाॅ. शिव कुमार व्यास. अज्ञेय के काव्य में प्रकृति. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(6):30-33,