Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 3 ISSUE.: 5(May 2024)
Author(s): अक्षय कुमार
Abstract:
लोक साहित्य, जो समाज की सामूहिक स्मृतियों, अनुभवों और सांस्कृतिक धरोहर का संगठित रूप है, आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। यह साहित्य समाज के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है और सामाजिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लोक साहित्य में लोकगीत, लोक कथाएँ, लोक नाटक और लोक चित्रकला जैसे विविध रूप शामिल हैं, जो समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों, धार्मिक मान्यताओं और नैतिक मूल्यों को संजोते हैं। आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव से लोक साहित्य की संरचना और विषयों में बदलाव आया है, परंतु इसकी सामाजिक भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। यह साहित्य न केवल सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करता है, बल्कि सामूहिकता, नैतिकता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को भी प्रोत्साहित करता है। डिजिटल युग में लोक साहित्य का संरक्षण और संवर्धन नए अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत करता है। डिजिटल माध्यमों के उपयोग से लोक साहित्य की व्यापक पहुँच सुनिश्चित की जा सकती है। इसके अलावा, सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास लोक साहित्य के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समकालीन मुद्दों, जैसे सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी प्रगति का लोक साहित्य में समावेश इसे और भी प्रासंगिक बनाता है। यह साहित्य समाज को इन मुद्दों के प्रति जागरूक करने और उनके समाधान के प्रति प्रेरित करने में सहायक है। इस प्रकार, लोक साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता वर्तमान समय में भी महत्वपूर्ण है। इसके संरक्षण और संवर्धन के प्रयास समाज के नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।
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Pages: 28-33 | 4 View | 0 Download
How to Cite this Article:
अक्षय कुमार. लोक साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(5):28-33,