Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 3 ISSUE.: 2(February 2024)

लाला जगदलपुरी के साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण चेतना


Author(s): चंद्रहास


Abstract:

प्रकृति मानव जीवन का आधार है। मनुष्य का अस्तित्व जल, वायु, वन, भूमि और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। भारतीय साहित्य में प्रकृति को केवल सौंदर्य के रूप में नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, संवेदना और आध्यात्मिक चेतना के अभिन्न अंग के रूप में देखा गया है। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार लाला जगदलपुरी ने अपने साहित्य में बस्तर की प्राकृतिक संपदा, घने वन, नदियों, पर्वतों, वर्षा, वन्यजीवन तथा आदिवासी संस्कृति का अत्यंत सजीव और यथार्थ चित्रण किया है। उनकी रचनाओं में प्रकृति केवल दृश्य-वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मानव जीवन, लोकसंस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन का आधार बनकर उभरती है। वे प्रकृति और मनुष्य के सह-अस्तित्व, पारस्परिक निर्भरता तथा पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल देते हैं। उनकी कविताओं और गद्य रचनाओं में जंगल, नदी, वर्षा, मिट्टी, खेत और वन्यजीवन के माध्यम से प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग तथा पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व का भाव व्यक्त हुआ है। प्रस्तुत शोध-पत्र में लाला जगदलपुरी के साहित्य में निहित प्रकृति-बोध, पर्यावरण चेतना तथा उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और समकालीन महत्व का विश्लेषण किया गया है। साथ ही यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि उनका साहित्य वर्तमान पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।

keywords:
लाला जगदलपुरी, प्रकृति, पर्यावरण चेतना, बस्तर, आदिवासी संस्कृति, लोकजीवन, वनस्पति, जैवविविधता, हरियाली, पारिस्थितिकी, संरक्षण।

Pages: 65-67     |    18 View     |    1 Download

How to Cite this Article:

चंद्रहास. लाला जगदलपुरी के साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण चेतना. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2024; 3(2):65-67,