Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 2 ISSUE.: 9(September 2023)
Author(s): चंद्रहास
Abstract:
छत्तीसगढ़ को उसकी प्राकृतिक संपदा, जंगल, पहाड़, नदियों और विविध लोकपरंपराओं के लिए जाना जाता है। इस सांस्कृतिक पहचान में आदिवासी समाज का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों में गोंड, मुरिया, मारिया, बैगा, उरांव, कंवर, कोरवा, पंडो आदि अनेक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। इन समुदायों का जीवन प्रकृति, जंगल, जमीन, कृषि, पशुपालन, लोकविश्वास, पर्व-त्योहार, लोकगीत और लोकनृत्य से गहराई से जुड़ा हुआ है। आदिवासी संस्कृति को केवल नाच-गाने या पारंपरिक वेशभूषा तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। इसके भीतर एक पूरी जीवन-दृष्टि दिखाई देती है, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं मानता। प्रस्तुत शोध-पत्र में छत्तीसगढ़ी आदिवासी संस्कृति के विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया गया है। इसमें प्रकृति के साथ आदिवासी समाज के संबंध, सामूहिक जीवन, लोकगीत, लोकनृत्य, पर्व-त्योहार, कला एवं शिल्प, भाषा, लोकविश्वास, महिलाओं की भूमिका तथा आधुनिकता के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। साथ ही यह देखने का प्रयास किया गया है कि बदलते समय में आदिवासी संस्कृति के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं और उसके संरक्षण के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। शोध से यह बात सामने आती है कि आदिवासी संस्कृति कोई पुरानी और स्थिर परंपरा नहीं है, बल्कि समय के साथ बदलते हुए भी अपनी मूल पहचान को बचाने वाली जीवंत संस्कृति है। मूल शब्द: छत्तीसगढ़, आदिवासी संस्कृति, जनजातीय समाज, लोकजीवन, लोकगीत, लोकनृत्य, प्रकृति, लोककला, परंपरा, सांस्कृतिक विरासत।
keywords:
छत्तीसगढ़ी आदिवासी संस्कृति प्रकृति, लोकजीवन, आदिवासी, लोकपरंपरा, लोककला, लोकविश्वास, सांस्कृतिक विरासत, आधुनिकीकरण, बदलता समय
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How to Cite this Article:
चंद्रहास. छत्तीसगढ़ी आदिवासी संस्कृति: प्रकृति, लोकजीवन और बदलते समय के संदर्भ में एक अध्ययन. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2023; 2(9):68-72,