Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.

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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 2 ISSUE.: 2(February 2023)

जाति संहार का स्वरूप एवं उसकी प्रकृति


Author(s): डॉ. राजबहादुर कुशवाहा


Abstract:

जेनोसाइड एक जातीय, प्रजातीय, सांस्कृतिक, धार्मिक अथवा वैचारिक मानव समूह के पूर्ण या आंशिक संहार के लिये किया गया सामूहिक नरसंहार है। जाति संहार के कई प्रकार हैं जैसे-अपने प्रतिद्वंदी के खतरे को पूरी तरह से मिटाने के लिये किया गया तथा दूसरा संपदा पर कब्जे के लिये किया गया तीसरा आतंक फैलाने के लिये किया गया एवं चैथा धार्मिक या राजनीतिक विश्वास पैदा करने के लिये किया गया जाति संहार।
वस्तुतः विचारकों द्वारा माना जाता है कि बहुलवादी समाजों में जातिसंहार अपरिहार्य रूप से उपस्थित होता है। एक अन्य प्रकार का जाति संहार भी विभिन्न परिस्थितियों में देखा गया है जहाँ महिलाओं को बंदी बनाकर व्यवस्थित बलात्कार किया जाता है और उन्हें तब तक बंदी रखा जाता है। जब तक वह गर्भवती न हो जाये ताकि नस्लीय, धार्मिक एवं सांस्कृतिक बदलाव किया जा सके और अपने जैसे समान समूह के लोगों की संख्या बढ़ाई जा सके। 
संयुक्त राष्ट्र में अनेक प्रकार के उपायों तथा अभिसमय बनाकर जाति संहार के रोकथाम के उपाय किये गये हैं। वर्तमान में जाति संहार को मानवता के विरुद्ध अपराधों में गिना जाता है। 1948 के अभिसमय में न केवल प्रत्यक्ष हत्या वरन् जातिसंहार का षडयंत्र या दूसरों की प्रेरणा भी व्यक्तिगत रूप से दण्डनीय है। चाहे वह संवैधानिक शासकों द्वारा किया गया हो या सरकारी तंत्र के सदस्यों द्वारा या साधारण व्यक्तियों द्वारा।

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How to Cite this Article:

डॉ. राजबहादुर कुशवाहा. जाति संहार का स्वरूप एवं उसकी प्रकृति. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2023; 2(2):33-34,