Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 1 ISSUE.: 2(November 2022)
Author(s): पूनम प्रसाद
Abstract:
‘छोटके चोर' सन् 1915 (द्विवेदी युग) में एक अल्पज्ञात पत्रिका 'कन्या मनोरंजन' इलाहाबाद में छपी थी। 'छोटके चोर' कहानी लोक की भाषा में रची गई है अर्थात् एक क्षेत्रीय भाषा अवधी में रची गई है। जिस समय में स्त्रियाँ नाम बदलकर नकली नामों अथवा अपने पति के नाम से रचनाएँ करती थीं वहीं लेखिका मोहिनी चमारिन ने अपनी अभिव्यक्ति खुल कर की है उन्होंने अपने असली नाम से रचना की। कहानी को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने जीवन संघर्षों व सामाजिक परिस्थितियों और विषमताओं के अन्तर्विरोधों की कथा इस कहानी में उकेरा है । यह कहानी ‘छोटके चोर' छोटे से चोर अर्थात् लल्लू की मासूमियत पर केन्द्रित है ।'छोटके चोर' एक सुखान्त कहानी है। इसमें आदर्श व यथार्थ दोनों एक साथ विद्यमान है। द्विवेदी युग में कहानी में इस तरह का शिल्प लाना जब एक तरह से कहानी विधा की शुरुआत ही हुई हो और वो भी उस समय की एक दलित स्त्री द्वारा यह अपने आप में एक बड़ी बात है। इस कहानी में 'यथार्थ' गरीब वर्ग के जीवन की सच्चाईयाँ, उनका संघर्ष, दवाईयों के लिए पैसे न होना, ईधर-उधर बंजारों की भाँति काम करना आदि जैसी परिस्थितियों के रूप में दिखाया गया है। लेखिका ने इस कहानी की कथा को कुछ इस प्रकार रचा है मानो यह कहानी नहीं बल्कि भोगा हुआ यथार्थ हो । इस कहानी में बाल-मनोविज्ञान का चित्रण मिलता है प्रेमचन्द के 'ईदगाह' कहानी के छोटे पात्र हामिद की भाँति 'छोटके चोर' में लल्लू अपनी संवेदना को व्यक्त करते हुए नज़र आता है। यह कहानी कहीं-कहीं गुदगुदाती भी है, हँसाती भी है, रुलाती भी है और पाठकों को सोचने पर मजबूर भी करती है । यह कहानी अब तक क्यों सामने नहीं आई और इसे हिन्दी साहित्य की कहानियों के इतिहास में जगह क्यों नहीं मिली यह अत्यन्त सोचनीय विषय है और दुखद भी।
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How to Cite this Article:
पूनम प्रसाद. द्विवेदी युग की लेखिका श्रीमती मोहिनी चमारिन की कहानी ‘छोटके चोर’ की समीक्षा. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2022; 1(2):01-04,